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Shrimadbhagwadgita (Kramik Svadhyaya) (Purvardh)
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Shrimadbhagwadgita (Kramik Svadhyaya) (Purvardh)
श्रीमद्भगवद्गीता (क्रमिक स्वाध्याय) (पूर्वाद्ध) 
Author Dr. Ramswaroop Brajpuriya
ISBN 978-81-7854-321-4
Edition 2018
Language Hindi

Format Price Discount New Price *
Hardbound Rs. 1750.00
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Rs. 1400.00
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Discription
महाभारतान्तर्गत भीष्म पर्व के अध्याय २५ से ४२ तक १८ अध्याय जिसमें श्रीकृष्णार्जुन आध्यात्मिक संवाद है उसको ही श्रीमद्भगवद्गीता नाम दिया गया है। ७०० श्लोकों में ब्रह्मविद्या, उपनिषद् और योगशास्त्र का सार आ गया है इसलिये इसे प्रामाणिक आध्यात्मिक शास्त्र (१) ब्रह्मसूत्र (२) उपनिषद् की कोटि का मान्य किया जाकर श्रीमद्भगवद्गीता सहित तीनों ग्रन्थों को प्रस्थानत्रयी कहा गया जो सभी आध्यात्मिक सिद्धान्तों (मतों) की कसौटी है। अर्थात् - फ्गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है जो पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से निःसृत वाणी है फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता?” प्रायः सभी विद्वानों, मनीषियों और तत्वज्ञानियों ने उस पर विचार कर पर्याप्त लिखा है और सर्वाधिक टीका, भाष्य इसी ग्रन्थ के है फिर भी मतभिन्नता इतनी है कि गीता का मूल स्वर क्या है इस पर बहुत विवाद चलता है। जिज्ञासुओं में, स्वयं मैं भी इस ग्रन्थ का ४० वर्षों से अनेक विद्वानों के भाष्य, टीका और लेखादि पढ़कर गीतोपदेश समझने का प्रयास कर रहा हूँ। अनुष्ठान के रूप में अनेक संस्थाओं द्वारा गीता के पठन की भी परंपरा है परन्तु मात्र परम्परागत गीता पाठ करने से वास्तविक चिन्तन मनन नहीं होता। अतः अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में मैंने गहन स्वाध्याय हेतु सन् २०१० में अपने अन्य गीता स्वाध्याय प्रेमी मित्रों के साथ एक फ्गीता स्वाध्याय मण्डल” का गठन किया। साप्ताहिक गोष्ठ्यिाँ प्रारंभ कीं जिसमें गीता स्वाध्याय को एक अनुष्ठान के रूप में प्रति सप्ताह मात्र पांच श्लोक का पाठ कर मनीषियों के भाष्य टीका के साथ पठन-पाठन कर गीता का मनन प्रारंभ किया। यह अनुष्ठान दिनांक १०-५-२०१० से प्रारंभ होकर दिनांक ७-८-१२ को कुल १०८ गोष्ठ्यिों में समाप्त हुआ। इस स्वाध्याय में पढ़े गये सभी भाष्य टीका आदि के उद्धरणों का संकलन करते हुये प्रतिगोष्ठी के मनन का सार संग्रह लेखबद्ध करता गया जिससे फ्श्रीमद्भगवद्गीता-क्रमिक स्वाध्याय” नाम से एक पाण्डुलिपि तैयार हो गई। यही इस प्रकाशित ग्रन्थ का परिचय और स्रोत है। गीता अध्याय ९ ‘राजविद्या राजगुह्ययोग’ श्रीमद्भगवद्गीता का मध्यान्ह है तथा अध्याय १ से ९ तक श्रीमद्भगवद्गीता पूर्वार्द्ध में भगवान कृष्ण का उपदेश पूरा हो जाता है आगे तो अब तक कहे गये विषय का ही विस्तार है कोई नया सिद्धान्त नहीं हैं।
 
 

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