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Bhartiya Chintan Parampara Par Sankhya-Yoga Ka Prabhav
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Bhartiya Chintan Parampara Par Sankhya-Yoga Ka Prabhav
भारतीय चिन्तन परम्परा पर सांख्य-योग का प्रभाव 
Author Dr. Shriprakasha Singh
ISBN 978-81-7854-211-9
Edition 2013
Language Hindi

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Discription
अनेक दार्शनिक विचारधारायें मनुष्य के उर्वर मस्तिष्क की उपज हैं। उनमें परस्पर मतभेद का होना स्वाभाविक है। यह भी निश्चित है कि दार्शनिक क्षेत्र में जितनी गहन साधना भारतवर्ष में हुई उतनी अन्यत्र नहीं हो सकी है। मननशील प्राणी मनुष्य के विचार-स्वातन्त्र्य का परिणाम ही दार्शनिक विचारों की भिन्नता का कारण होता है। विश्व के सभी दार्शनिकों में चिन्तन साम्य नहीं है। भारतवर्ष की दार्शनिक विचारधारायें भी परस्पर खण्डन मण्डन में प्रकृत रही है।
विज्ञान के चमत्कार की चकाचौंध में एवं दार्शनिक जटिलताओं ने जनमानस के मन में बैठा दिया है कि दर्शन साधुओं और बेकारों का विषय है। अतः दार्शनिक परम्परा को सरलतम रूप में प्रस्तुत कर, वैज्ञानिक चकाचौंध के बीच जगत के शाश्वत प्रश्न एवं चिन्तन से अवगत कर अन्वेषोनुमुखी करने का प्रयास है।
एतदर्थ, भारतीय दर्शन के अध्ययन में निप्त विद्वज्जन स्वकीय आभा से उद्भासित फ्सांख्य-योग दर्शनय् से सम्यक् परिचित हैं। अतः भारतीय दर्शन की जटिलता का तुलनात्मक अध्ययन एवं सांख्य-योग का प्रभाव इस ग्रन्थ में प्रतिपाद्य है।
सांख्य-योग का ही प्रभाव इसलिए निर्धारित किया गया है कि श्रीमद्भगवद्गीता की आधुनिक लोकप्रियता सांख्य-योग के मूल सिद्धान्तों को समझाने में सहायक रही है। प्राचीनतम दर्शन होने के कारण इनका प्रभाव किसी न किसी प्रकार आज तक के भारतीय चिन्तन परम्परा पर अवश्य ही पड़ा है।

 

 

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