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Hindi Ke Ritimukta Kavya Main Kriyapad-Sanrachana
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Hindi Ke Ritimukta Kavya Main Kriyapad-Sanrachana
हिन्दी के रीतिमुक्त काव्य में क्रियापद-संरचना 
Author Dr. Durga Prashad Srivastava
ISBN 978-81-7854-248-5
Edition 2013
Language Hindi

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Hardbound Rs. 950.00
20%
Rs. 760.00
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Discription
शब्द और अर्थ की संहति ‘सहित्य’ अथवा ‘वाङमय’ कही जाती है। बुद्धि प्रधान वाङमय ‘शास्त्र’ और हृदय प्रधान वाङमय ‘काव्य’ कहा जाता है। शास्त्र ज्ञान का तथा काव्य भाव का साहित्य माना जाता है। किसी शब्द की आत्मा में प्रवेश करने में अथवा उसकी विविध अर्थच्छायाएँ पकड़ने में समर्थ कवि ही मनीषी, परिभू एवं स्वयंभू माना जाता है। कवि विविध अनुभूतियों के प्रकाशन के लिए शब्द और अर्थ के साहित्य (मेल) की शक्ति पर अवलम्बित होता है—‘कबिहि अरथ आखर बलु साचा।’ आधुनिक समीक्षक कविता (काव्य) को भाषा का विशिष्ट रूप या भाषिक कला मानते हैं। कोई पाठक या समालोचक किसी काव्य-कृति में व्यक्त एवं अव्यक्त (निहित) लालित्य तक तभी पहुँचता है, जब वह भाषा का कवच भेद लेता है।  पाठक या समालोचक को उस भाषा की संरचना के विश्लेषण-विवेचन में प्रवृत्त होना पड़ता है, जिसमें उसके समालोच्य कवि की अनुभूति अवतीर्ण है।
शब्द (पद) की निर्विवाद महिमा से प्रेरित होकर ही रीतिमुक्त कव्य में प्रयुक्त क्रियापदों की संरचना विश्लेषित-विवेचित की गयी है। भारतीय काव्यशास्त्र का सम्बन्ध व्याकरण से भी है। शब्द का अध्ययन दोनों में होता है। शैलीविज्ञान को भी व्याकरण या भाषाशास्त्र से सहायता लेनी पड़ती है। इङ्गित क्रियापदों के इस अध्ययन में काव्यशास्त्र का भी आंशिक व्यवहार हुआ है। यह रीतिकाव्य की भाषाशास्त्रीय एवं काव्यशास्त्रीय दृष्टियों से समीक्षा करने वाले गवेषकों के लिए विशेषापयोगी सिद्ध हो सकता है। इसकी मौलिकता तथा उपयोगिता पर आगे भी आलोक निक्षिप्त किया गया है, अतएव पुनरावृत्ति से बचना है।
 

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