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Acharya Dr. Prabhudyalu Agnihotri Ji Ka Sanskritvanmaya Ko Yogdan
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Acharya Dr. Prabhudyalu Agnihotri Ji Ka Sanskritvanmaya Ko Yogdan
आचार्य डॉ. प्रभुदयालु अग्निहोत्री जी का संस्कृतवाङमय को योगदान 
Author Dr. Kamlesh Kumar Dube
ISBN 978-81-7854-250-8
Edition 2013
Language Hindi

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Hardbound Rs. 750.00
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Discription
संस्कृत की सेवा सम्पूर्ण मानव-समाज की सेवा है। संस्कृत भाषा और साहित्य सम्यक्शोभन और सुसंस्कारोपेत सर्जना है। संस्कृतवाङमय को योगदान देने वाले परम मनीषी एवं श्रेष्ठ साधक आचार्य डॉ. प्रभुदयालु अग्निहोत्री जी ने वैदिक वाङमय, भारतीय दर्शन, संस्कृतसाहित्य में निरूपित प्राचीन भारतीय समाज एवं संस्कृति, इतिहास तथा धर्मशास्त्र आदि का गहन-अध्ययन, चिन्तन एवं मनन कर उक्त विषयक प्रेरक ग्रंथों का प्रणयन कर विश्वमानव-समाज को एक विशद ज्ञानकोश उपलब्ध कराने का श्रेय लिया है। आचार्य जी ने संस्कृतकाव्य ‘त्रिपथगा’ तथा हिन्दी काव्य, नाटक, कहानियों आदि का प्रणयन कर भारतीय संस्कृति को जीवन्त रूप प्रदान करने हेतु उक्त को समाज के समक्ष प्रस्तुत कर एक महनीय कार्य किया है। आपका संस्कृत में विरचित अभिनव मनोविज्ञान मौलिक एवं अमूल्य देन है।
आचार्य डॉ. अग्निहोत्री जी का संस्कृतवाङमय रचना संसार बृहत् है। उक्त पर शोध-समीक्षण समाजोपयोगिता की दृष्टि से आवश्यक था। अस्तु डॉ. कमलेश कुमार दुबे ने आचार्य जी की प्रायः सम्पूर्ण रचनाधर्मिता का अनुशीलन कर उसमें सन्निहित प्रकृति, पर्यावरण, संस्कृति, समाज, राजनीति,  राष्ट्रीयता, नीति, अध्यात्म, दर्शन, कर्म, व्यवहार, सिद्धान्त, मानवता, जीवनमूल्य आदि विषयक तत्त्वों को इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है, साथ ही आचार्य जी के काव्यों का सम्यक् समीक्षण कर उनकी साहित्यिक नववोन्मेषशालिनी प्रतिभा को उजागर करते हुये संस्कृतवाङमय को उनके अपरमित योगदान का प्रत्यक्षीकरण कराया है।
डॉ. कमलेश दुबे का यह ग्रन्थ महामनीषी आचार्य डॉ. अग्निहोत्री जी की कृतियों एवं उनके शोधपूर्ण समीक्षण-विवेचन से संस्कृत के अध्येताओं को उत्प्रेरणायें प्रदान करेगा तथा समाज के लिये परमोपयोगी सिद्ध होगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।
 
 

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