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Sanskrit Evm Hindi Kavyashastra (Alankar Vivechan)
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Sanskrit Evm Hindi Kavyashastra (Alankar Vivechan)
संस्कृत एवं हिन्दी काव्यशास्त्र (अलंकार विवेचन) 
Author Dr. Kakoli Ray
ISBN 978-81-7854-251-5
Edition 2013
Language Hindi

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Discription

संस्कृत एवं हिन्दी काव्यशास्त्र (अलंकार विवेचन)

(दो भाग में)

प्राचीनकाल से ही काव्यात्मक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के लिए कवि विविध प्रकार के प्रयोग करते रहे हैं, उसके रूप में समयानुसार परिवर्तन होता रहा है। वैदिक मन्त्रों में ‘ऋषियों’ की एसी ही सौन्दर्य साधना ऋग्वेद में प्राप्त होती है। भारतीय साहित्य तथा जन-जीवन के इतिहास में इतने विरोधों का युग शायद ही रहा हो, एक ओर संस्कृत के दिग्गज पंडित कवि, अपनी चरम सीमा पर पहुँची हुई अलंकृत काव्य-परंपरा साथ लेकर, दूसरी ओर अपभ्रंश के कवि अपनी सहज सरल भाषा में संक्षिप्त शब्दों में अपने मनोभाव अभिव्यक्त कर रहे थे। आदिकाल में अलंकारों के प्रयोग की प्रक्रिया अपने ढंग की मिलती है। ‘पृथ्वीराजरासो’ में कवि ने अनेक प्रसिद्ध अलंकारों को बड़ी कलात्मकता के साथ प्रयोग किया है। जैन-काव्यों में कल्पना-सौन्दर्य अधिकांशतः संस्कृत के गद्यात्मक एवं पद्यात्मक काव्यों में प्रचलित अलंकारों द्वारा प्रस्तुत हुआ है। भक्तिकाल में संतों के लिए काव्यरचना एक साधन था, साध्य नहीं। संतो ने हृदय की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए काव्य को माध्यम बनाया। रीतिकालीन आचार्यों का अलंकार चिन्तन प्रायः संस्कृत के काव्याचार्यों के अनुरूप ही है। इस काल में लिखित विविध काव्यशास्त्रीय ग्रंथों पर संस्कृत काव्यशास्त्रज्ञों की विचारधाराओं का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। रीतिकाल के आचार्यों ने बाइस नवीन अलंकारों का वर्णन किया है। आधुनिक काल के साहित्य चिंतन में अलंकार पर सभी प्रमुख साहित्य चिंतकों ने फुटकर क्रम में विचार किया है। नये कवि सिद्धान्ततः अलंकार को मात्र चमत्कार सृष्टि का उपादान नहीं मानते और न ही वे उसे कविता के लिए अनिवार्य तत्त्व मानते हैं। इस प्रकार अलंकार विवेचन देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार व्यापक और विकसित होता रहा है। हालाँकि अलंकार की मूल अवधारणा प्रायः स्थिर बनी रही है, इस रूप में कि वह काव्य का सौंदर्य विधायक तत्त्व है।

 

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