Change Currency :   
Dr. Rakeshgupta Rachnavali
Book Detail
Categories
Home > All Books > Book Detail  

Dr. Rakeshgupta Rachnavali
डॉ॰ राकेशगुप्त रचनावली 
Author Ed. Neeraja Tandon
ISBN 978-81-7854-260-7
Edition 2013
Language Hindi, English

Format Price Discount New Price *
Hardbound Rs. 9500.00
20%
Rs. 7600.00
    * Postage & Handling Charges Extra
Discription
डॉ॰ राकेशगुप्त रचनावली
(पाँच भाग में)
प्रस्तुत ग्रन्थावली कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा के धनी, अनवरत साहित्यसाधना में संलग्न रहनेवाले सारस्वत साधक के साहित्यिक और शास्त्रीय अवदान का दस्तावेज है। इसके द्वारा डॉ. राकेशगुप्त के व्यक्तित्व और शोधार्थी, कवि, निबन्धकार, संस्मरण लेखक, सम्पादक, समीक्षक, भाषावैज्ञानिक रूप का परिचय मिलता है। राकेशगुप्त के समग्र लेखन को इस ग्रन्थावली के पाँच खण्डों में प्रस्तुत किया गया है। 
ग्रन्थावली के प्रथम खण्ड में राकेशगुप्त के व्यक्तित्व के सन्दर्भ में अनेक रचनाकारों, चिन्तकों, गुप्त जी के परिवारजनों, सुहृद् मित्रें द्वारा संस्मरण लिखे गए हैं, जो उनके उदात्त, विशाल और भव्य व्यक्तित्व को रूपायित करते हैं। ग्रन्थावली के दूसरे खण्ड में डॉ. राकेश गुप्त की प्रथम शोधकृति ‘साइकोलौजिकल स्टडीज़ इन रस’, ‘आस्वादन सिद्धान्त’ को रखा गया है। ग्रन्थावली के तीसरे खण्ड में गुप्त जी की दूसरी शोधकृति ‘स्टडीज़ इन नायक-नायिका भेद’, षोडष नायिकाएँ तथा इन कृतियों की समीक्षाएँ शामिल की गई हैं। ग्रन्थावली के चौथे खण्ड में राकेशगुप्त की कविताओं लेखों, निबन्धों, भाषणों को सम्मिलित किया गया है। इस खण्ड के पहले भाग में उनकी काव्यकृति -रहना नहिं देस बिराना है की कविताएँ, प्राक्कथन एवं प्रकीर्णक में प्रकाशित कविताएँ तथा गद्यगीत शामिल हैं, दूसरे भाग में सूर-सूर तुलसी ससी नामक कृति के शोधपरक आलेख तथा प्राक्कथन एवं प्रकीर्णक में प्रकाशित डॉ. कृश्णदेव उपाध्याय, डॉ. अम्बाप्रसाद सुमन, डॉ- मनोहरलाल गौड़, डॉ. श्रीकृष्ण वार्ष्णेय, डॉ. विश्वनाथ शुक्ल, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि के सन्दर्भ में लिखे छोटे-छोटे संस्मरण तथा प्रसिद्ध आर्यसमाजी श्री बाँकेलाल कंसल के लिए लिखा गया संस्मरण शामिल हैं, ग्रन्थावली के तीसरे भाग में गुप्त जी की कृष्णकाव्य और नायिका भेद नामक पुस्तक को शामिल किया है और चौथे भाग में उनकी लघु रचना ‘हिन्दी कोशों में भ्रष्ट शब्दक्रम’ को रखा गया है। पाँचवें भाग विविधा में में गुप्त जी के द्वारा लिखी गई भूमिकाएँ, कवि परिचय, निबन्ध, दिए गए भाषण, वक्तव्य आदि शामिल हैं_ छठे भाग में इन सभी कृतियों के प्रति प्रतिक्रियाओं को सम्मिलित किया गया है। ग्रन्थावली के पाँचवें खण्ड में राकेश जी की आत्मकथा-‘देखे सत्तर शरद्-बसन्त’ का प्रकाशन किया गया है।
राकेशगुप्त की शोधकृति ‘साइकोलौजिकल स्टडीज इन रस’ भारतीय काव्यशास्त्र के आद्याचार्य भरतमुनि द्वारा स्थापित रस विषयक मान्यताओं से लेकर रससिद्धान्त विषयक आधुनिककाल तक की मान्यताओं को परखकर मनोवैज्ञानिक आधार पर रससिद्धान्त की पुर्नपरीक्षा करके व्यावहारिक दृष्टिकोण से उसकी व्याख्या की है।
राकेशगुप्त की दूसरी साहित्यशास्त्रीय कृति है ‘स्टडीज इन नायक नायिका भेद’। तीन खण्डों में लिखित इस कृति में संस्कृत और हिन्दी साहित्य में नायक-नायिका भेद विषयक विस्तृत वर्णन को सविस्तार परखा है और फि़र नायक-नायिकाभेद के विषय में मनोवैज्ञानिक तथा समीक्षात्मक अध्ययन किया है। इस कृति की विशेषता यह है कि इसमें रीतिकाल पर लगे चाटुकारिता, चमत्कारवाद और आलंकारिकता आदि विषयक आरोपों का बड़ी गम्भीरता और सूक्ष्मता से खण्डन किया है ।
राकेशगुप्त की तीसरी अत्यन्त उल्लेखनीय कृति उनकी ‘देखे सत्तर शरद्-बसन्त’ नामक आत्मकथा है, जिसके माध्यम से एक ओर डॉö गुप्त का स्नेहशील, दृढनिश्चयी, स्वाभिमानी, सत्यप्रिय, मृदुभाशी, न्यायप्रिय रूप सामने आता है और इसके साथ-साथ एक कुशल प्रशासक, सर्वप्रिय अध्यापक, स्वतन्त्रचेता, मौलिक उद्भावनाओं से सम्पन्न गम्भीर साहित्यकार का। यह कृति एक लेखक के जीवन संघर्ष और हिन्दी जगत् के, हमारे प्रशासनिक चरित्र का बेबाक दस्तावेज है।
‘रहना नहिं देस बिराना है’ राकेशगुप्त की विभिन्न विषयों से सम्पन्न, कविताओं का संकलन है जिसमें कवि राकेशगुप्त ने अपने विशाल समाज के विविध रूपों का, विभिन्न सामाजिक समस्याओं के प्रति अपनी चिन्ता का, अपने राजनैतिक परिदृश्य का, विभिन्न साहित्यकारों के प्रति अपने आदर का, अपने परिवारजनों के प्रति अपनी ममता, स्नेह ओर आदर का परिचय दिया है। 
‘कृष्णकाव्य और नायिकाभेद’ तथा ‘सूर-सूर तुलसी ससी’ नामक अपनी निबन्धात्मक कृतियों में राकेशगुप्त ने अनेक मौलिक उद्भावनाएँ की हैं। इनके अलावा राकेशगुप्त की काव्यशास्त्रीय कृति ‘आस्वादन सिद्धान्त’ में रसास्वादन के सन्दर्भ में अनेक मौलिक उद्भावनाएँ हैं और ‘षोडष नायिका’ में भारतीय काव्यशास्त्र में वर्णित नायिकाओं में से रस-भावादि का वहन करने वाली सोलह नायिकाओं के भावों का सुन्दर, सरल, स्पष्ट और विवेकपूर्ण विवेचन किया गया है। ‘हिन्दी के शब्दकोशों का भ्रष्टक्रम’ नामक कृति राकेशगुप्त के हिन्दी भाषा विषयक चिन्तन की प्रस्तुति है।
यह ग्रन्थावली साहित्य के अध्येताओं, समीक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों कों राकेशगुप्त के साहित्यिक अवदान का नई दृष्टि से पाठ करने के लिए निस्सन्देह प्रेरित करेगी। 
 
 

Eastern Book Linkers
Home | About Us | New Arrival | Best Sellers | Author Invitation | All Books| Contact Us