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Sahityanusheelan
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Sahityanusheelan
साहित्यानुशीलन 
Author Dr. Rakesh Gupta, Dr. Rishi Kumar Chaturvedi
ISBN 978-81-7854-254-6
Edition 2013
Language Hindi

Format Price Discount New Price *
Hardbound Rs. 1750.00
20%
Rs. 1400.00
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Discription

हिन्दी समीक्षा आज एक नया रूपाकार ले रही है और उसकी निर्मिति में एक ओर हमारे भारतीय काव्यशास्त्र की सुदीर्घ परम्परा का आधार रहा है और दूसरी ओर पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र का अनुप्रभाव है। वस्तुतः हिन्दी साहित्य की सम्यक् व्याख्या करने के लिए आज ऐसे शास्त्र की महती आवश्यकता है, जिसमें भारतीय एवं पाश्चात्य समीक्षाशास्त्रीय चिन्तन को समंजित किया जाय। प्रस्तुत पुस्तक में लेखकद्वय ने भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का अत्यन्त गम्भीर अनुशीलन किया है और काव्यशास्त्र के तमाम सम्प्रदायों, आन्दोलनों और सैद्धान्तिक मतभेदों के बीच एक मूलभूत एकता को खोजने का प्रयास किया है तथा समसामयिक साहित्य को परखने के लिए कतिपय मानकों का निर्धारण किया है। यह पुस्तक बाइस अध्यायों में लिखी गई है। इन अध्यायों में सर्वप्रथम भारतीय एवं पाश्चात्य मनीषियों के साहित्य के प्रयोजनों, साहित्य की प्रेरणा, हेतु तथा साहित्य के स्वरूप के विषय में किये गए चिन्तन को परखा गया है इसके उपरान्त भारतीय काव्यशास्त्र के रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति और औचित्य सिद्धान्तों पर नई दृष्टि से देखा, परखा और प्रस्तुत किया गया है। भारतीय काव्यशास्त्र में भरतमुनि से लेकर आधुनिक काल तक के समीक्षकों के चिन्तन को प्रस्तुत करने के साथ ही पश्चिम के प्लेटो से लेकर नई समीक्षा तक के साहित्यशास्त्रीय विचारों को बड़े मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। साहित्य के गुण-दोषों पर भी लेखकद्वय ने विचार किया है। आधुनिक समय में हिन्दी साहित्य की विधाओं-नाटक, एकांकी, कविता, कथासाहित्य, निबन्ध और स्मारक साहित्य का तात्त्विक विवेचन किया है और इस तरह से साहित्य-समीक्षा की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए साहित्य विषयक सार्वकालिक मानकों की प्रतिष्ठा की है। इस पूरी कृति में भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों, विचारों को ऐतिहासिक दृष्टि से तो परखा ही गया है, यह निष्कर्ष भी दिया गया है कि प्रायः समस्त विश्व के समीक्षाजगत् में यह तथ्य सर्वस्वीकृत है कि किसी भी रचना की समीक्षा किसी भी आधार पर की जाय, पर रचना की सार्थकता मूलतः इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितनी सहृदय-हृदय-संवादी है। विश्वास है कि अध्यापकों, शोधार्थियों, साहित्य के विद्यार्थियों के लिए यह कृति उपादेय होगी।

 

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