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Sanskrit Vanmaya Main Daya Vibhag Vyastha
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Sanskrit Vanmaya Main Daya Vibhag Vyastha
संस्कृत वाङ्मय में दाय विभाग व्यवस्था  
Author Manju Narang
ISBN 978-81-7854-185-3
Edition 2010
Language Hindi & Sanskrit

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Hardbound Rs. 1450.00
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Discription

दाय विभाग अथवा सम्पत्ति विभाजन वैदिक काल से लेकर अधुना पर्यन्त विवादास्पद विषय रहा है। संस्कृत वाङ्मय में एतद् विषयक पर्याप्त साहित्य उपलब्ध होता है। सन्तान दम्पत्ति के लिए ईश्वर प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ उपहार है। संस्कृत वाङ्मय में पुत्र प्राप्ति को सौभाग्य कारक, वंशवर्धक, माता पिता के लिए सुखकारक, वंश परम्परा की वृद्धि करने वाला तथा इह लौकिक एवं पारलौकिक कष्टों का मुक्ति प्रदाता माना गया हैं इस सकल विश्व का निर्माण स्त्री तथा पुरुष के संयोग से हुआ है। पुरुष के समान ही स्त्री को भी समाज में सुप्रतिष्ठित करने की भावना से, उसे आर्थिक सुरक्षा तथा सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए संस्कृत वाङ्मय में स्त्री धान पर विचार किया गया है। संस्कृत वाङ्मय के मस्तक स्वरूप वेद भारतीय संस्कृति के मूल स्रोत, अनन्त ज्ञान राशि के अक्षय भण्डार तथा अप्रतिम ज्ञान के पर्याय हैं। स्मृति शास्त्र कल्याण प्रदान करने वाला, बुद्धि वर्धक, यश एवं आयु प्रदान करने वाला तथा निःश्रेयस की प्राप्ति करवाने वाला माना गया है। रामायण विशुद्ध संस्कृति, आदर्श समाज, उच्च नैतिक मूल्य तथा श्रेष्ठ काव्य के रूप में गौरवान्वित है। महाभारत पवित्र धर्म शास्त्र, श्रेष्ठ अर्थशास्त्र तथा सर्वोत्तम मोक्ष शास्त्र माना जाता है। शुक्र नीति भारतीय समाज के भव्य विचारों को अभिव्यक्त करने वाले आदर्श ग्रन्थ के रूप में ख्याति प्राप्त है। कौटिलीय अर्थशास्त्र भारतीय राजतन्त्र पर एक उत्कृष्ट शोध ग्रन्थ के रूप में गौरवान्वित है। निबन्धकारों, टीकाकारों तथा व्याख्याकारों ने दाय भाग पर मूल ग्रन्थ में उक्त युक्तियों तथा अयुक्तियों की आलोचना के स्थान पर स्वविवेकानुसार कल्पित उपायों की सहायता से उनके समर्थन का तथा स्वविचार को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत पुस्तक में दाय विभाग पर विचार उपर्युक्त ग्रन्थों में प्राप्त विवरणां पर पृथक् विचार करने के उपरान्त आधुनिक युग में विद्यमान दाय विभाग व्यवस्था पर विचारोपरान्त आधुनिकयुगीन दाय विभाग व्यवस्था की प्रासंगिकता पर विचार संस्कृत वाङ्मय में वर्णित दाय विभाग व्यवस्था के आधार पर किया है।

 

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