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Sambandhatattva
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Sambandhatattva
सम्बन्धतत्त्व 
Author Dr. Tanuja Raval
ISBN 978-81-7854-200-3
Edition 2011
Language Hindi & Sanskrit

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Discription
भारतीय दर्शन परम्परा में न्याय के दो स्वरूप हैं एक तो वह स्वरूप, जो गौतम के न्यायसूत्र से प्रारम्भ होकर नव्यन्याय तक जाता है, दूसरा स्वरूप वह है, जिसमें प्रत्येक भारतीय दर्शन सम्प्रदाय अपनी-अपनी एक अलग न्याय-परम्परा रखता है और इसी अर्थ में वेदान्त, बौद्ध, जैन आदि वेदान्तन्याय, बौद्धन्याय, जैनन्याय इत्यादि नामों से अभिहित होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक गौतमन्याय, बौद्धन्याय और जैनन्याय से सम्बद्ध है। यहाँ गौतमन्याय से अभिप्राय हैµन्यायशास्त्र नामक वह सम्प्रदाय, जिसकी परिधि में अक्षपाद गौतमकृत न्यायसूत्र से आरम्भ करके उदयनकृत परिशुद्धिटीका तथा विश्वनाथवृत्ति आते हैं। बौद्धन्याय में यहाँ विशुद्ध विज्ञानवाद को तथा जैनन्याय में अकलड्ढकृत न्यायव्यवस्था को आधार बनाया गया है। इन तीनों ही सम्प्रदायों में सम्बन्ध- तत्त्व, जोकि दो पदार्थों को परस्पर जोड़ता है, का विवेचन पुस्तक की विषय-वस्तु है। पुस्तक के तीन भाग हैं। प्रथम भाग में सम्बन्धतत्त्व तथा भारतीयन्याय के तीनों सम्प्रदायों (गौतमन्याय, बौद्धन्याय तथा जैनन्याय) का विवेचन है। द्वितीय भाग में प्रमाण एवं पदार्थमीमांसा के आधार पर इन तीनों सम्प्रदायों के मतानुसार सम्बन्धतत्त्व का विवेचन किया गया है। तृतीय भाग में बौद्धन्याय द्वारा अपने सिद्धान्तों के अनुरूप सम्बन्धतत्त्व का खण्डन तथा समन्वयवादी जैननैयायिकों द्वारा बौद्धन्याय के तर्कों का खण्डन करके पुनः सम्बन्धतत्त्व की स्थापना की गई है। अतः पुस्तक में सम्बन्धसिद्धि के तीन चरण हैं
गौतमन्याय द्वारा सम्बन्धतत्त्व की स्थापना,
बौद्धन्याय द्वारा सम्बन्धतत्त्व का खण्डन,
जैनन्याय द्वारा बौद्धन्याय का खण्डन करके पुनः सम्बन्धतत्त्व की स्थापना।
 
 

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