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Rajasthan Ke Mandiron Ka Vastushastriya Adhyan
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Rajasthan Ke Mandiron Ka Vastushastriya Adhyan
राजस्थान के मंदिरों का वास्तुशास्त्रीय अध्ययन  
Author Umashankar
ISBN 978-81-7854-201-0
Edition 2011
Language Hindi

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Discription

हमारी संस्कृति का मूल आधार धार्मिक सहिष्णुता और साम्प्रदायिक सद्भाव रहा है। किसी स्थान विशेष की संस्कृति को जानने में इतिहास और भौगोलिक परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इसी क्रम में भारतीय इतिहास में राजस्थान का न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से अपितु धार्मिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। कालींगबा, आहड़ आदि स्थानों पर हुई खुदाई से प्राप्त मृण मूर्तियों तथा अन्य वस्तुओं से स्पष्ट है कि आज से पाँच-छः हजार वर्षों पूर्व यहाँ अति समृद्ध संस्कृति पल्लवित और पुष्पित हुई। इसी समृद्ध संस्कृति का की सुपरिणाम है कि राजस्थान मन्दिर-स्थापत्य का भी धनी रहा है। नगरी से प्राप्त स्तम्भ, बौद्धस्तूप (उदयपुर) आदि प्राचीन स्थापत्यकला की दुहाई देते हैं। तत्पश्चात् मूर्तिकला की दृष्टि से बीकानेर का संग्रहालय काफी धनी है, जहाँ अनेक प्राचीन मूर्तियाँ राजस्थानी स्थापत्यकला की समृद्धता को परिलक्षित करती है। इस प्रकार यहाँ न केवल मन्दिर-वास्तु के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं अपितु शैव, शाक्त, सौर, जैन, बौद्ध आदि विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के विकसित स्वरुप को भी देखा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक छः अध्यायों में विभक्त है और इन अध्यायों में राजस्थान के इतिहास, भौगोलिक स्थिति, धार्मिक सहिष्णुता, मन्दिरों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए वास्तुशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। भौगोलिक विविधता के फलस्वरूप राजस्थान के विभिन्न राजवंशों की संस्कृति बाह्य आक्रमणों से अन्य प्रदेशों की अपेक्षा कम प्रभावित हुई। यहाँ शासन करने वाले परमार, प्रतिहार, चौहान, गुहिल वंशी राजपूतों ने अंग्रेजों के आधिपत्य से पूर्व इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखा। इसी विविधता से परिपूर्ण राजस्थान में फलीभूत सहिष्णुता और सुरक्षा के कारण ही गुजरात और मध्यप्रदेश के समृद्ध परिवारों ने भी सांस्कृतिक विकास में योगदान दिया। इस अध्ययन से स्पष्ट होगा कि भारत में मन्दिर ईसा की 5वीं शताब्दी से मिलने प्रारम्भ होते हैं, उसके पहले के काल के केवल अवशेष मिलते हैं। विकास के काल (लगभग 700 ई. से 1000 ई. तक) में उत्तर भारत के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मन्दिरों में से अनेक राजस्थान में बनें। इन मन्दिरों ने चरमोत्कर्ष के काल (लगभग 1000 ई.1300 ईö तक) की शैलियों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। राजस्थान देश के उन थोडे़ से भागों में से एक था, जिनमें 13वीं शताब्दी के बाद भी मन्दिर-निर्माण का क्रम जारी रहा। इसी क्रम में यह पुस्तक धार्मिक सहिष्णुता रखने वाले और वास्तुशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए एक विनम्र प्रयास है। 

 

 

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